कहां हैं वे फूल, वे किताबें कहां हैं?




एक शायर ने लिखा था, "अब के बिछड़े हम शायद ख्वाबों में मिले, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले "। दरअसल यह ग़ज़ल उस गुजिश्ता ज़माने की यादगार ग़ज़ल है, जब फूल खिलते थे और हाथों में किताबें होती थी। किताबों के सेफ पालते जाते थे। यह किताबों और नोट्स बनाने का ज़माना था। किताब का कोई पेज या हिस्सा अच्छा लगता तो उसमे एक फूल दबाकर रख दिया जाता था। ये सूखे फूल एक पूरी क्रमिक यादगारों का हिस्सा होते थे। कभी नोट्स एक्सचेंज के बहाने या किताब के लेन-देन पर वह फूल वाला हिस्सा खुल जाता तो इसके मायने समझने में देर नहीं लगती थी। पर यह तब इतना आसान भी नहीं होता था। खुदा का केहर की जब तक मोहब्बत का इज़हार करना होता कि बिछुड़ने के कई बहाने बन जाते।  माशूका के निकाह की खबर मिलती या उनके अब्बू की बदली दुसरे शहर में हो जाती।  रह जाते थे वो सूखे फूल, जो किताबों में एक यादगार बनकर बस जाते थे। मोहब्बत तो मोहब्बत होती है। जब तक रहती है बहुत शिद्दत से मन पर छाई रहती है फिर तो सूखे फूलों का ही सहारा होता। 

 

उस ज़माने में रंग-बिरंगे फूल बहुत होते थे। छोटा-सा घर हो या बड़ा, हरी घास का एक टुकड़ा घर के आगे ही होता था। उसके छआरों ओर क्यारियां में फूल खिले होते थे। एक फूल तोडा और उसे सहेजकर किताब या नोटबुक में दबा दिया। जब भी किताब या नोटबुक के नोट्स की अदला-बदली होती तो वे सूखे फूल उसी ख़ास जगह दबे मिलते, जहाँ भावनाओं और अनुभूतियों का इजहार करना होता था। किताबों की या नोट्स की अदला-बदली में यह सूखे फूल मोहब्बत का पैगाम होते। इससे बढ़कर या इससे सुन्दर कोई और प्यारा-सा पैगाम का माध्यम हो सकता था? 

 

ज़्यादातर मोहब्बतें नाकाम रहतीं। जब कभी मौका मिलता या समय तो किताबों की रैक को यूं ही खंगाला जाता। तब वह सूखे फूल एक याद की तरह नज़रों से गुज़र जाते।  पता नहीं कितनी यादें लिए वह ज़माना कैमेरे की रील की तरह आँखों के सामने एक के बाद एक यादें लिए गुजरता जाता। 

 

अब मोहब्बतें गम हो गयी हैं। sms और ईमेल का तथा इससे आगे बढ़कर फेसबुक और इंस्टाग्राम का ज़माना है। इन्हे जब भेजा जाता है तो इनमे रखे हुए सूखे फूलों की वह भीनी-सी महकती खुशबू नहीं होती। अब फूलों की क्यारियां भी तो नहीं दिखती। दूर दूर तक रंगीनियत से भरे इठलाते-खिलते फूल कहीं दिखलाई नहीं पड़ते। यहाँ तक की वे किताबें भी कहां हैं, जिन्हे दोनों हाथों से थामकर दुपट्टे के नीचे दबाये क्लास रूम में दाखिल हुआ जाता था। आजकल नोटबुक के नोट्स की अदला-बदली नहीं होती जो सूखे हुए फूल कोई पैगाम ले आएं या ले जाएं। कोई ज़रूरी मसला कहना होता है तो ईमेल से फॉरवर्ड कर दिया जाता है। अब! इस ईमेल को कहां तक सेव करके इसमें सूखे फूलों की खुशबू सूंघेंगे ?

 

ख़याल आ रहा है कि अगर वो शायर होते तो आज किताबों कि इस गैर मौजूदगी  पर क्या ग़ज़ल कहते ? कंप्यूटर पर ईमेल से या मोहब्बत पर  sms से भेजे मोहब्बत के संदेशों में किन सूखे फूलों से उस मोहब्बत कि याद करते? वाकई हम बिछुड़ गए हैं। मोहब्बत भी खो गयी है फूल भो तो कंप्यूटर या मोबाइल पर खिलकर सूखकर बेशुमार यादों का पिटारा खल नहीं सकते। कहा हैं वे फूल, कहां हैं? वे किताबें कहां हैं ?


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